सभी देश-प्रदेशवाशियों को हरेले की हार्दिक शुभकामनाएं। पूरे कुमाऊं में मनाया जाता है हरेला पर्व। कैसे मनाते है और क्या मान्यता है इस पर्व की जाने इस खबर पर।

हरेले की बहुत बहुत शुभकामनाएं। हैप्पी हरेला।

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Newsupdatebharat/ Report Yashu Rajput

Uttarakhand  – उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विशेष तौर पर कुमाऊं में हरेला मनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। हरेला का तात्पर्य हरियाली से है। कुमाऊँनी लोगों में हरेला बहुत ही लोकप्रिय पर्व है। क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान को बहुत पसंद है। उत्तराखंड देवभूमि है। हरेले का त्योहार उमंग और उत्साह के साथ मनाये जाने वाले पर्व है। इस ऋतु पर्व को अन्य स्थानीय उत्सवों में सर्वापरि स्थान मिला हुआ है। साथ ही यह त्यौहार सुख समृद्धि, संस्कृति, कृषि, हरियाली, प्रकृति को समर्पित है।

 

हरेले की बहुत बहुत शुभकामनाएं। हैप्पी हरेला।

 

कुमाऊं मंडल में हरेला पर्व श्रावण के प्रथम दिन यानि कर्क संक्रान्ति को मनाया जाता है। पहाड़ में सौरपक्षीय पंचांग का चलन होने से ही यहां संक्रांति से नए माह की शुरुआत मानी जाती है। अन्य त्यौहार जहां वर्ष में एक बार मनाये जाते हैं, वहीं हरेला पर्व सावन के अलावा अशोज और चैत्र माह में भी मनाया जाता है। कुमाऊं के ज्यादतर इलाकों में सावन वाला हरेला ही मनाया जाता है।

सम्पूर्ण धरा में जब हरियाली छाने लगती है तब उसी उल्लास में यहां के लोग इस पर्व को मनाने की तैयारियों में जुट जाते है। हरेला बोने के लिए हरेला त्यौहार से लगभग 12 दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। घर के पास शुद्ध स्थान से मिट्टी निकाल कर सुखाई जाती है। और उसे छान कर रख लेते हैं। और परम्परानुसार हरेला त्योहार पर्व से नौ अथवा दस दिन पहले पत्तों से बने दोने या रिंगाल की बनी टोकरियों में हरेला बोया जाता है। इन पात्रों में उपलब्धतानुसार पांच, सात अथवा नौ प्रकार के अनाज धान, गेहूं, मक्का, तिल, उरद, गहत, भट्ट, जौं और सरसों के बीजों को बोया जाता है। उसके बाद घर के मंदिर में रखकर इन टोकरियां को रोज सुबह शाम पूजा करते समय जल के छींटों से सींचा जाता है। दो-तीन दिनों में ये बीज अंकुरित हो जाता है, फिर धीरे धीरे बढ़ता है और हरेले के दिन तक सात-आठ इंच लम्बे तने का आकार हो जाता है। हरेला के एक दिन पहले सन्ध्या पर विधिवत पूजा की जाती है और इन तनों को पेड़ पौधे की लकड़ी की पतली टहनी से गुड़ाई करते है।

हरेला पर्व के दिन मंदिर में विधि-विधान के साथ पूजा कर टोकरियों में उगे हरेले के तनों को काटा जाता है। उसके बाद घर-परिवार के सयाने- बड़े लोग अपने दोनों हाथों से हरेले के तनों को लेकर सभी के पांव, घुटनां और कन्धे से स्पर्श कराते हुए और आर्शीवाद देते हुए हरेला गीत वचनों के साथ बारी-बारी से घर के सदस्यों के सिर पर रखती हैं। और चिरस्थायी रहने की मंगल कामना करती हैं।

हरेला घर के सदस्यों के सिर पर रखते हुए  यह वचन बोले जाते हैं।

जी रया जागि रया,यो दिन यो मास भेंटने रया, दुब जस पनपी जाया, अगास जस उच्च, धरती जस चकाव है जाया, सिंह ज तराण,स्याव जस बुद्धि हो, हिमाव में ह्ंयू रुण तलक गंग-जमुन में पाणि रुण तलक जी रया जागि रया।

इस वचन का अर्थ है कि – तुम जीते रहो और जागरूक बने रहो, हरेले का यह दिन-वार महीना आता-जाता रहे, वंश-परिवार दूब की तरह पनपता रहे, धरती जैसा विस्तार मिले आकाश की तरह उच्चता प्राप्त हो, सिंह जैसी ताकत और सियार जैसी बुद्धि मिले, हिमालय में हिम रहने और गंगा जमुना में पानी बहने तक इस संसार में तुम बने रहो।’

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