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उत्तराखंड

हरक सिंह रावत की ‘रंगीन मिजाजी की परते खुल रही है … जेनी ने डीजीपी से मिलकर दोबारा जांच की मांग करते हुए न्याय की लगाई गुहार

 

उत्तराखंड की राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा और संवेदनशील *‘सेक्स स्कैंडल* ’ एक बार फिर राज्य की सियासत में भूचाल लाने के लिए तैयार है। असम से न्याय की उम्मीद लेकर देहरादून पहुंची पीड़िता जेनी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपने बेटे के डीएनए (DNA) मिलान की मांग की है।

 

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘ *अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस* ’ की नीति और अंकिता भंडारी केस में हुई त्वरित कार्रवाई से हौसला पाकर जेनी 23 साल बाद फिर से कानूनी और सामाजिक लड़ाई के मैदान में उतरी है।

उत्तराखंड की सियासत में ‘रंगीन मिजाजी’ और रसूख के बल पर मामलों को रफा-दफा करने का दौर अब खत्म होने वाला है। 23 साल पहले जिस कांड ने सूबे की राजनीति को हिलाकर रख दिया था, उसकी राख के नीचे दबी चिंगारी एक बार फिर धधक उठी है। जेनी प्रकरण की पीड़िता न्याय की आस में असम से सीधे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून पहुंच चुकी है। मीडिया के कैमरों के सामने आकर पीड़िता ने जो गुहार लगाई है, उसने कांग्रेस से लेकर सूबे के सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

 

 

*”मेरे बेटे को बाप का नाम चाहिए…”*

देहरादून में मीडिया से मुखातिब होते हुए जेनी ने सीधे तौर पर पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत को कटघरे में खड़ा किया। रुआंसी आंखों लेकिन फौलादी इरादों के साथ जेनी ने कहा, *“मेरा रेप हुआ है*। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि हरक सिंह रावत और मेरे बेटे के DNA का मिलान हो। मेरे बेटे को उसके बाप का नाम चाहिए, उसका हक चाहिए।” जेनी ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि महज 16 साल की उम्र में उसे गर्भवती कर दिया गया था और जब उसने अपने हक और न्याय की आवाज उठाई, तो रसूखदारों ने उसे गुमराह कर, धक्के मारकर भगा दिया था।

*जब गंवानी पड़ी थी लाल बत्ती, पर ‘अपनों’ की सरकार ने बचा लिया!*

यह मामला आज का नहीं बल्कि 23 साल पुराना है। जब यह आरोप लगे थे, तब तत्कालीन सरकार में हरक सिंह रावत को अपना मंत्री पद तक गंवाना पड़ा था। लेकिन आरोप है कि चूंकि उस वक्त सूबे में उन्हीं की पार्टी की सरकार थी, इसलिए सत्ता और प्रभाव का इस्तेमाल कर जांच की दिशा को बदला गया और मामले को रफा-दफा करवा दिया गया। चालबाजियों के पर्दे के पीछे सच को दो दशकों तक दबाकर रखा गया, लेकिन सच कभी मरता नहीं है।

 

*धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से जगी उम्मीद*

आखिर जेनी में *23 साल बाद यह हिम्मत कहां से आई?* जेनी का साफ कहना है कि *उसने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली को देखा है* । अंकिता भंडारी हत्याकांड में जिस तरह सीएम धामी ने तत्परता दिखाई, आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा और इतनी सख्त पैरवी करवाई कि अपराधी जेल से बाहर न आ सकें; उसी इंसाफ ने जेनी को हौसला दिया।

 

जेनी ने उत्तराखंड के कार्यवाहक डीजीपी से मुलाकात कर अपने साथ हुए इस जघन्य अन्याय की दोबारा जांच कराने की मांग की है। उसने सीधे मुख्यमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा, ” *जिस तरह आपने अंकिता भंडारी को न्याय दिलवाया, मुझे पूरा भरोसा है कि आप मुझे और मेरे बेटे को भी इंसाफ दिलाएंगे।”*

*कांग्रेस आलाकमान की चुप्पी पर बड़े सवाल?*

*‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’* का नारा देने वाली कांग्रेस का आलाकमान इस वक्त पूरी तरह खामोश है। उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक इस गंभीर मामले पर सन्नाटा पसरा हुआ है। यक्ष प्रश्न यह है कि *क्या राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा देश की इस बेटी के साथ खड़े होंगे?* क्या वे अपनी ही पार्टी के बड़े नेता रहे हरक सिंह रावत के खिलाफ निष्पक्ष जांच और पीड़ित महिला को न्याय दिलाने के लिए उत्तराखंड सरकार से मांग करेंगे? या फिर राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर इस पर भी चुप्पी साध ली जाएगी?

 

 

* *समाजसेवी और एक्टिविस्टों से अपील*

अब देखना यह होगा कि देश भर में रेप पीड़ितों की आवाज बुलंद करने वाली *योगिता भयाना* जैसी सशक्त एक्टिविस्ट, जो इंडिया गेट से लेकर राजघाट तक न्याय के लिए धरना-प्रदर्शन करती हैं, इस लड़ाई में जेनी का साथ देने देहरादून कब पहुंचती हैं।

 

 

उत्तराखंड की जनता और देश की निगाहें अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर टिकी हैं। क्या 23 साल पुराने इस रसूखदार सियासी ‘पाप’ का अंत होगा? क्या एक बेबस मां के बेटे को उसका हक मिलेगा? जेनी की यह दहाड़ बता रही है कि इस बार लड़ाई आर-पार की होगी और *हरक सिंह रावत की पुरानी चालबाजियों की कलई खुलकर रहेगी।*

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